समझौता नहीं करना

समझौता नहीं करना

कि इस दिवानगी में, हमें हद से है गुजरना।
चाहें जो भी हो हश्र, समझौता नहीं करना।।

कि काटो पे चलके, ये गुलाब हैं पाना
चाहें घाव लगे गहरे, हमें नहीं मुकरना।।

कि डूब जाए नशेमे, वो जाम है पीना।
ये आंखें नशीली हैं, कुछ और नहीं करना।।

कि फक्र नहीं लोगो की, क्या इनसे लेना देना।
घबराएगा ये समाज, सुनो हमें नहीं डरना।

कि हाथ थाम लिया तो, फलक तक हैं चलना।
अफसाने सुने लोग, वो अधुरा इश्क़ नहीं करना।।

कि जीवन सातो जनम का, अब ही है जीना।
तुम्हारे बग़ैर हो जो मौत, बार बार नहीं मरना।।

कि इस दिवानगी में, हमें हद से है गुजरना।
चाहें जो भी हो हश्र, समझौता नहीं करना।।

©लहू भालेराव

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बहुत खुब!! Really loved it… it’s a kind of poem I couldn’t easily forget !!

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Thanks :heart_eyes::hugs:

bahut khoob kalam chali hai tumhari dost
kya gazab ka post likha hai
nice :+1::+1::+1:

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Beautiful motivated work

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True that @axy

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