रंग-बिरंगी कविताएँ

कभी सुकून, कभी उग्रता
तो कभी भीनी-सी मुस्कान दे जाती है,
ये सात रंगों से सजी कविताएँ,
एक साथ कितनी आभास दे जाती है;

मैं जब थक जाती हूँ जमाने से
तब ये मुझे अपने गोद में सुलाती है,
मैं जब रूठ जाती हूँ खुद से
तब ये मुझे बड़े लाड़ से मनाती है;

कभी चीखती है, चिल्लाती है
कभी डर से सहमा जाती है,
ये कविताएँ कभी हमसफ़र
तो कभी हमराज़ बन आ जाती है;

ये कविताएँ
मुझे इंद्रधनुष लगती है,
हर बार मेरेे मन में हुई
बारिश के बाद ही दिखाई दे जाती है।।

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are wah… bohot khoob likha hai…

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@Rupa_dey
kabhi kabhi tumhare post padhne ke baad sabd nhi hote
samajh nahi aata kaise ya kaun se sabd tumhari taareef me poore rahenge

nice post once again friend

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Such an creative overall structured view on poetry.
Amazing

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