तुम्हे कौई अनदाजा नही!

डर भरे थे इतने उसके दिल मै…
कि तुमहे कोइ अनदाजा नहीं।
शीशे के है महल उसके…
और हवा का उसे कोइ अनदाजा नहीं।
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उसकी वहा होने कि भी वजह थी…
अौर तुम तक ना पहोच पाने की भी।
अौर आज जहा से वो देख रही जहा को…
उस तनहाई का, तुम्हे कौई अनदाजा नही!
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कौई चोट उसे आज तक आई नही…
कभी दिल किसी ने उसका तोडा नही।
पहरेदारीयो मे रही है जो आज तक…
बीना सहारे के कैसे चल लेते हौ तुम…
उसे कौई अनदाजा नही!
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वक्त बीता, दरवाजे खुले…
और उसे नीकाल दीया गया।
खुद का खयाल ना रखा था जीसने…
उसे एक रोज से सब को सम्भालने को मजबूर किया गया।
उस जैसा होजाने से…
कितना सहम जाती हुँ मै भी…
तुम्हे कौई अनदाजा नही!
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आजादी मांगती थी वो…
मांगती हुँ मै भी।
आजदी ही तो मिली थी उसे…
पाना चाहती थी जीसे मै भी!
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जिस वक्त नीकलना था उसे…
खुदका वजुद बताने को।
दर्द भरे इतने उसके दिल मे…
कि तुम्हे कौई अनदाजा नही!
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कैदी थी… कैदी वो रह गई…
एक दम से मीली धुप मे वो जल के रह गई!
उस लडकी को काबील बनाना कीतना जरुरी था!!
आज भी इस एहसास का…
किसी को कौई अनदाजा नही!!!

-axy

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Bahut khoob, Bahut khoob
very nice post and a nice comeback after few days
welcome once again @axy

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Quite elaborated thought process but good

Thank you so much @Ravi_Vashisth

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Thank you for appreciating @navjyotsingh.rajput :blush:

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