शाहीर वाणी ...😇।

तर्क मे तू डूबा रहा ,
तर्क साबित न होए।
जब विवेक पे कंकर पड़े,
तो तर्कहीन जग होये ।

मेरी सीमा कहाँ तक है ,
पूछो कभी न भाऊ ।
सीमाहीन सदा रहा ,
मन तो बंधा न जाऊ ।

आवत सब अच्छे भये ,
जावत पुतला बन ।
खाली तन मे आये सभी ,
चले बाँधे कफ़न ।

जब मेघ न बरस्या ,
रोया मन मयूर ।
शाहीर मन का भया ,
तृष्णा से अति दूर ।

व्यथा सभी की एक है ,
स्वरुप भये अनेक ।
अहं भाव न गयो ,
का पंडित ,का शैख़ ।

जब - जब पीड़ा आगयो ,
नास्तिक बना वे संत ।
जो कल तक था जगदीश,
पत्थर बना भगवंत ।

मन चिंता का गढ़ भया ,
चिंता शांति हराये ।
पल - पल अनमोल हीरा है,
कहीँ ये बीत न जाए ।

मै रंग दीन लेवत फिरा ,
दीनबंधु मिला न कोए ।
बेरंग् होने से अच्छा ,
बे - दिन मनवा होए ।

                  - शाहीर रफ़ी
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bohot hi umda veer… :clap:

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are boss gazab
umda
dhaasu

bahut bhadiya bahut bhadiya

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