प्रभात

उठ जा शिशिर अब अस्त हो गया है
अभी अभी देख दिनकर प्रकट हो रहा है
अभी भी समय है चहक ले परिंदे
पंखों में कोई हवा भर रहा है

वो कोई तुम्हीं हो,
जो पहचाना स्वयं को
सह कर शिशिर देखो,
स्वागत तुम्हारा वसंत कर रहा है

अभी भी समय है
कहती है तेरी वो सोई उम्मीदें
देख आज दिनकर उदय हो रहा है
अस्त हुई रजनी, प्रभात पल पुकारे

सोचा बहुत, कुछ पल थे संवारे
सोचते रहोगे या भागोगे तुम भी
सोच कर ही मोती बने कुछ क्षडिक पल
मोतिमाला की प्रतिक्षा समय कर रहा है

उड़ ले परिंदे समय आ गया है
अब सोच ना कुछ भी समय कह रहा है
इस भरे आसमा में पहचान खुद को
वजूद की तलाश आसमा भी कर रहा है

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:crossed_fingers::kissing_heart::smiley::butterfly: