आजादी

वो सरहद पर खड़े रेहते हैं जान कि बाज़ी लगा कर,
वो आसमां में लम्बी उड़ाने भरते हैं अपनी सीमाएं बचाने,
वो महीनों लहरों से लड़ कर भी हटते नहीं मुकाम से,
वो लड़ते हैं हर रोज़, हर परिस्थिति में देश कि आज़ादी के लिए,
मगर उनकी आज़ादी का क्या,
उनकी हसरतों का क्या,
जो बचाने खड़े हैं देश को वहाँ,
जिन्हें पता तक नहीं कौन कौन है यहाँ,
उनके परिवारों को सम्भालने कभी कोई आता नहीं,
पैसों से उनके ज़ख्मों की भरपाई होती नहीं,
वो लड़ते हैं हर पल देश को अपना घर समझ कर,
उनकी परेशानियां, मजबूरियाँ कोई समझता नहीं,
क्यूं उनके घर बचाने कोई आता नहीं,
फिर भी वो लड़ते हैं हर रोज, हर परिस्थिति में देश की आज़ादी के लिए।

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