मुहब्बत अल्फाजों में (محمد طیب)

खुद को ठोकरों में फेंका है
फिर तुझको पाया है
हर लम्हा हर पल मैने
तुझे सांसों में बसाया है
जो तू नहीं दिल में मेरे
जिदंगी ये जार ज़ार है
इसलिए दिल के हर कोने में
तेरी सूरत को सजाया है
खुद को ठोकरों में फेंका है
फिर तुझको पाया है
तब जाकर जिस्म मेरा ये
पूरा हो पाया है

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