वोह पुराना मफलर

सुनो , पता है सर्दियां आ गई है
और साथ में निकल आया है , तुम्हारा दिया हुआ वोह गर्म मफलर , जिसके धागों पर कभी गढ़ा था तुमने, नाम हमारा
यह कहते हुए की, कैसे यह मफलर के धागे , इन धागों संग जुड़ के इक आम सी चीज़ को नायाब कर रहे है , उसी प्रकार हमारा साथ , प्यार कि खूबसूरती की नई पराकाष्ठा को लिखेगा ।
कितना आसान हुआ करता था ना,
यह सब कहना बिना भविष्य की संभावनाओं का आंकलन किए, की
कभी ना कभी , कैसे ना कैसे
इस मफलर के धागे निकलेंगे उधड़ेंगे ज़रूर, जैसे हमारा रिश्ता उधड़ा था ,
कभी ना कभी , उन धागों की गांठ टूटेगी ज़रूर , जैसे हमारा रिश्ता टूटा था
कि कभी तो , मफलर का रंग उड़ने लगेगा , जैसे हमारा रिश्ता बेजान हुआ था
फिर एक समय ऐसा आएगा ,जब वह मफलर वक्त की मार से पहचान मे नहीं आएगा ,
ठीक वैसे ही जैसे मै तेरे लिए अनजान हुआ था।
लेकिन तेरे छोड़ जाने का मुझे अब कोई रोष नहीं है ,
तू खुश है अपनी ज़िन्दगी मे,
और मै वजह ढूंढ रहा हूं , अपने खुश होने की
इसलिए वापिस से
वोही एक बिना पते का खत भेज रहा हूं, इस उम्मीद से की कभी ना कभी कैसे ना कैसे यह तुम तक पहुंच ही जाएगा
और अगर मिल जाए तो जला देना इस मफलर को ,
क्योंकि साथ तेरे मै अपना नाम लगा नहीं सकता।।

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Wah❤️