मज़ा आ गया ....।

एक बात कही उन्होंने ,और कुछ शब्द निकाले अपनी शब्कोष रुपी पोटली से ,कुछ हेर-फेर किया और एक रचना पढ़ डाली । दर्शक चिल्ला उट्ठे - " वाह भाई ,मज़ा आ गया " । भाव रूपी सृंगार था या न था ,महफ़िल को उससे क्या मतलब ।वह तो बस बर्फ़ी पर चांदी की परत लगाना जानती है ।अजी कोई निंदक भी आए ,तो कहें - " मज़ा आ गया "।और इन्ही शब्दों की साज़िशों में इस युग का साहित्य पनपता है । पारितोषिक के प्रेमियों में एकाग्रता की कमी सी पाई जाती है । शेर ओ शायारी ,कैसे भी लिख लि जाती है और आवाम यूँ ही कह देते हैं - " मज़ा आ गया " । और कोई कुछ सुधार या तंज लाने की कोशिस करे, तो उसपर चाँद को थूकने का इलज़ाम लग जाता है । हमें यह समझना चाहिए ,के " मज़ा आ गया " तभी कहें जब वाकई में मज़ा आया हो । उपर से कहना मतलब ,झूटी वाह - वाहि है । " मज़ा आ गया "- यह ऐसा होना चाहिए के इसकी मिठास ,आख़री स्वास तक न जाए ।

- शाहीर रफ़ी
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bahut khoob, bahut khoob :+1::+1::+1:

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