दिल्लगी (ख़ता )

काश के दिल्लगी का भी कोई दस्तूर होता ।
हम जो दिल न लगाते तो भी हमारा ही कुसूर होता ।

तुम ज़माने की सोच लो ।
हमें तो तुम्हारा हर फैसला आज भी क़ुबूल है कल भी मंज़ूर होता।

मंज़ूर : accept .

Shah Talib Ahmed

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:heart::heart:

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Bhut sundar !

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