तनहाई ऐसी है

रात की चादर ओढ़ के
वोह याद का पंछी जोर से
कांच की खिड़की पर आ बैठे
फैला पंखों को चहुं ओर से
रूप ऐसा विकराल बनाए ,
पास किसी को आने ना दे
ऐसे अंधकार में डाले मुझको
साथ किसी का पाने ना दे
घेर ले घर को मेरे ऐसे
जैसे सर पर मेरे आकाश ना हो
तनहाई ऐसी है ,
जो मार रही है
मगर शरीर को जैसे कोई आभास ना हो

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Wah bohot khoob.

Beautiful. :heart:

bahut khubsurat @Ashutosh_Burnwal