जहां अक्सर हम मिलने आते थे

उस नीम के तिरे,
कभी सांझ-सवेरे जहां हम मिलने आते थे
क्या याद है
वोह मोड़ , उस छोर का जहां हाथ
हमारे जुड़ जाते थे
होता था सर तेरा , कांधे पर मेरे
अल्फ़ाज़ सीधे दिल को जाते थे
ना राह की सूध रहती,
ना जमाने कि हमे
कुछ इस कदर , इक-दूजे में खो जाते थे
कदम साथ उठते थे ,
धडकनों से एक सुर आते थे
क्या याद है
वोह नीम का तिरा
जहां अक्सर हम मिलने आते थे

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Beautiful. :heart:

nice :clap::clap::clap: @Ashutosh_Burnwal