याद हैं मुझको

किताबें छीन ली मुझसे
पर सबक याद हैं मुझको
जो फैली थी इल्म से
वो चमक याद हैं मुझको ।

सवारी थी जो कुदरत ने
वो दुनिया कहीं गुम हैं
अंधेरे हैं फैले हुए पर
वो धनक याद हैं मुझको ।

दगे और झूठ का व्यापार
नहीं आता है इस दिल को
जो खाया था कभी एक बार
वो नमक याद हैं मुझको।

मिल बांट के खाने का हुनर
यूँही तो नहीं आया है
भूख से बिलकते बचपन की
वो तड़प याद हैं मुझको।

गुनाह हुए, गुमराह हुए
नफ्स ने भटकाया बोहत है
फिर भी रब तक जाती है जो
वो सड़क याद हैं मुझको ।
Hamida

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Kya khoob likha hai. :heart:

Thank you

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