क्योंकी इश्क़ नहीं है , जरा भी नहीं

अलगाव से हमारे , कुछ टूटा ही नहीं
जैसे इस एकाकी जीवन में,
कोई था ही नही
अभी तो सिर्फ बाते हुई थी इश्क़ की,
इश्क़ में कहां डूबे थे हम
चलो हम भी मान लेते है की
इश्क़ कभी हुआ ही नहीं
जिसे सजाया था हमने, दिल की दीवार पर
देख ना सका , की वोह किराएदार
कभी हकदार बना ही नहीं
और मत पूछो क्यों दर्द भरा है ,
मेरी कलम में इतना
क्योंकी नहीं है दर्द , जरा भी नहीं

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Beautifully written. :heart:

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