वोह मटर का दाना

कभी देखा है आपने ,
बिरयानी में पड़े उस मटर के दाने को
जिसकी किसी को ज़रूरत नहीं होती
ना ही देता है कोई , तव्वजो उसे
पड़ा रहता है वोह सा,
अपने अस्तित्व से कोसों दूर
जहां उसकी कोई एहमियत नहीं
ना ही कोई चाहता है , की मो
फिर भी परोसा जाता है उसे , हर मेजबान की प्लेट पर
मुझे पूछना है , उस खानसामे से क्यों
क्यों तुम वोह चीज बनाते हो
जिसकी किसी को ज़रूरत नहीं,
जिसको देता नहीं एहमियत कोई
जिसके अस्तित्व के होने ना होने का फर्क उठना है पड़ता है,
जितना उस बिरयानी में पड़े उस मटर के दाने की होती है,
जिसकी किसी को ज़रूरत नहीं,

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Biryani Bina matar ke Dane ke ban sakti hai magar agar pav bhaji khani hai toh matar zaroori hai. Sab ki Apni ahmiyat hai kisi na kisi ko zaroorat hai. So cheer up. Keep writing.

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Wonderfully written
@Ashutosh_Burnwal
:bouquet::clap:

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You have given a great example @Ashutosh_Burnwal, for the people who feel unwanted. :open_hands:
I agree with @Hamida, it’s so true, I love how you say it. :heart: We are all perfect for different places, we all are given this life for some purpose. :heart:

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@Hamida tabhi to yeh sawal aaya jehen me, ki jiski jahan zàrurat ho , usse wahan daaliye
Biryani matar ke bina ban skti hai to bina matar hi sahi, kya zarurat hai , add onn krne ki

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Yeh toh pasand pasand ki baat hai
Na tere haath hai na mere haath hai.
Tumhara matar ka Dana Mujhe Bichara laga aur tumhe bekaar laga
Kuch mere jazbaat hai kuch there jazbaat hai

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पसंद ना पसंद तो दूर हुआ, यह तो जबरदस्ती थोपा है
जिसे नकारा ना जा सके , यह वोह तोहफा है
ना मैंने कभी मांग की, ना उसने(भगवान) कभी ज़रूरत समझी
अब मै क्या मानु इसे
खुद की बुरी किस्मत , या उसकी ना समझी
@Hamida

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Kuch Bhi nahin Bas Zara si jugalbandi :smile:

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