चांद फलक का

पर्दा कितना भी करो, फिर भी यह उभर आता है
दर्द दिल का , आंखो में उतर हो जाता है

मै बैठा था, रात से उसकी एक झलक की ताक में
भूल बैठा की , सांझ के बाद ही सूरज आता है

जिसे कहते है ग़ज़ल , ग़ज़ल नहीं दर्द-ए-दिल है मेरा
मुझ नाकारे को और कौनसा हुनर आता है

फिजाएं आज भी महकती है , उसकी खुशबुओं के आगोश में
साथ मुद्दत का हो , तभी इसका हुनर आता है

राहें वीरान रही मेरी , सफर भी तन्हा
इस बिखरे दिल के साथ , कहां कोई हमराह नजर आता है

छोड़ साहिल को जाता नहीं , समंदर ये कहीं
पास दरिया के तो प्यासा भी बसर आता है

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Bohot khub. :thought_balloon::heart: