पगलु हो तुम।

तुम,
तुम लगते हो उस सांज की भांती।

डूबते सूरज और उगते चांद के संगम बिच।
कभी दिल में प्यार, तोह कभी आंखो में गुस्सा

मन चंचल सा लेकीन कोमल फुलो की कलियों से भी।
जाननी तुम्हे दुनिया सारी, छूने मानो इन्द्रधनुष के रंग सारे।

यू तोह भय पता ही नी क्या होता तुम्हे, लेकीन बात आती अपनो की तोह कायनात ढा ने की भी ठान लोगी तुम ।।

तुम्हारी कलम तिक्ष्ण कभी सुई की भांती तोह नाज़ुक और शीतल रुई से भी, सारे उनम्दो का संगम हो तुम।।

आँधी से लढ जाए वो तुफान हो तुम,।
हाँ पगलु हो तुम।।

मुस्कान की वजह हो तुम। निराशा का अन्त हो तुम,
साधरण दिन को भी अविस्मरणीय बना दे वो फरिश्ता हो तुम।
प्यार की व्याख्या हो तुम, मधुरता का प्रतिक हो तुम।

चपड बुद्धि और नूर का नगीना हो तुम।
मुशिक्लो में भी हस दे वो कहानी हो तुम।

प्यार और उमंग की चेतना हो तुम।
पग्लू हो तुम।।

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Pyara hai. :heart:
Likhte raniye. :heart:

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Shukriya🖤

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