कुछ खास नहीं

इक रिश्ता , आधा-कच्चा सा
इक फरेब है थोड़ा सच्चा सा
जज्बातों के ऊपर पर्दे सा
एक बहाना थोड़ा अच्छा सा

जीवन का वोह साथी जो , हर सांस में है
पर पास नहीं
कोई पूछे तुमसे , क्या था मै
कह देना , कोई खास नहीं
आया था वोह इक झोंके सा
इक बारिश, जिसमे आवाज़ नहीं
थोड़ा साथ रहे , कुछ जुमले सुने
वोह पल था बस , और कुछ खास नहीं
वोह राहगीर इक मोड़ का ,
इक समंदर , जिसकी दिल को प्यास नहीं
कोई पूछे तुमसे , क्या था मै
वोह पल था , जिसका कोई एहसास नहीं

यूं तो तसव्वुर तेरा हर रोज़ करू मैं
मगर आंखो को तेरी तलाश नहीं
जैसे चीखें भरी हो दिल के भीतर
मगर मुंह खोलो तो आवाज़ नहीं
वैसे पाया तुझे कभी मैंने नहीं
फिर भी खोने से डरता हूं
हर रोज़ तेरे चेहरे को , किसी किताब के जैसे पढ़ता हूं
तू मेरी किस्मत का वोह सितारा है
जिससे मुझे अब कोई आस नहीं
कोई पूछे अगर अब कौन है तू
मै भी कह दूंगा ,
कोई खास नहीं

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The rhythm of this poem is so beautiful. :heartpulse: