मेरे पंख नहीं, मैं हवा नहीं

मेरे पंख नहीं, मैं हवा नहीं
ये ज़मीं आसमां है मेरी।
मुझे सरहदें समझ नहीं आती
और सरहदों को कहाँ परवाह है मेरी।

मैं खुशबू हूँ, अगर बिखरु
तो मेहक जाए हर एक कोना।
यहीं फ़ितरत है क्या करे
नहीं मिलती कोई दवा है मेरी।

मैं लहू हूँ, अगर रगों में बहुं तो ज़िंदा हो
और रगों से बहुं तो ज़ख़्मी हो।
मैं ज़ात बिरादरी नहीं जानता
हर ज़िंदगी ही जहाँ है मेरी।

न पेड़ों की छाँव है जागीर किसी की
न बारिश की बूंदों पे कब्ज़ा किसी का।
ये रंग रूप, धर्म ज़ात नहीं देखते हैं
सबको देते है बराबर, न रखते हिस्सा किसी का।
तुम मानो न मानो कोई हर्ज नहीं
ये पुरी कायनात तो गवाह है मेरी।

मेरे पंख नहीं, मैं हवा नहीं
ये ज़मीं आसमां है मेरी।
Hamida

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bahut khubsurat lekha hai aapne @Hamida

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Bohot khub. :heart:

बेहद खूबसूरत
अतुल्य, अद्भुद

बहुत अच्छा लगा अपने बीच एक ऐसे मझे हुए कलाकार को देख कर
आपको नमन हमारा
@Hamida :clap::clap::clap:

Thanks. I need to learn a lot yet.
Abhi kahan manjhe hai.

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Thank you

Thanks . You always appreciate and that means a lot.

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This groundness shows your big and kind nature
:slightly_smiling_face:

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Behad umda :heart::heart:

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