इश्क़-ए-आलम...❤।

इश्क़ ,मुश्क़ ,वफ़ा , जफ़ा ,

यह सब बेतुके बेकार की बातें हैं ।

किसी के अश्क़ में झांक कर देखो,

मालूम होगा क्या प्यार की बातें हैं ।

  • शाहीर रफ़ी

मन अक़्सर यह पेचीदा सवाल करता है ,के इश्क़ अगर होता है तो सच्चे इश्क़ की पहचान क्या है ? या यूँ कहें के मुहब्बत किसको कहतें हैं ?
तो सीधे - साधे अलफ़ाज़ में पीर जुल्फीकार अहमद साहब अपनी पुस्तक -" तम्मना-ए-दिल " में यह लिखते हैं :
" मुहब्बत कहते हैं अपने आपको किसी और में ग़ुम कर देने को ।की इंसान किसी में मीट जाए और ग़ुम हो जाए ।"
हर वक़्त जो सच्चा आशिक़ है उसका ध्यान अपने महबूब की तरफ केंद्रित रहना चाहिए । "महबूब " एक ऐसा अलफ़ाज़ है जिसके बदौलत होंठ के दो हिस्से आपस में तीन बार गले मिलते हैं ।ऐसा सुनने में आता है कि मजनूँ नाम का शख्स हज़रत हसन के समय में था और इसका अर्थ होता है " पाग़ल " । " मजनूँ "कोई नाम नहीं बल्कि एक उपाधि था जो " क़ैस " नामक व्यक्ति को मिला था क्योंकि वह लैला के इश्क़ में बावरा था । “क़ैस " लब्ज़ का मतलब होता है - अक्लमंद या बुद्धिमान ।” लैला " का नाम लैला इसीलिए था ,की वह रात की तरह काली थी।माँ बाप ने इसीलिए उसका नाम लैला रख दिया ।जब लैला मजनूँ की दास्ताँ आम होगयी ,तो वहाँ के हुक्मरां(बादशाह) को “लैला” को देखने की जिज्ञासा बढ़ी ,के कौन है ऐसी हूर -परी जिसपर क़ैस इतना फ़िदा है । लेकिन जब लैला को देखा ,तो उसके होश ही उड़ गए । आख़िर हर इंसान की नज़र मजनूँ जैसी जो नहीं होती । जो जिस्मानी मुहब्बत को अफ़ज़ल समझतें हैं ,उन्हें शायद बुढ़ापे का तस्सवुर ही नहीं होता होगा । अजी सच्चा इश्क़ सूरत से नहीं अपितु सीरत से होता है । किसी के आँखों के अश्क़ में झांक कर देखो ,बिना कोई मिलावट वाला इश्क़ मिलेगा ,हाँ लेकिन बस शर्त यही है के वह आँसू मगरमछ के न हों ।यह चार पंक्तियों को बयां, करने के लिए इन उदाहरणों का सहारा ले रहा हूँ ।

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