इश्क़ का पहला नज़राना ...।

मैं उसे क्या समझता हूँ ,वह मुझे क्या समझती है ,
मैं उसे जाँ समझता हूँ ,वह मुझे बेहया समझती है ।

                   - शाहीर रफ़ी 

कभी - कभी छोटी मोटी नोक - झोक भी बड़ी प्यारी होती है,तुलु-ए-इश्क़ इन छोटी मोटी नोक - झोक से ही निखरता है ।मैंने उस से ऐसे टूट कर इश्क़ किया है कि तंज में भी मिठास आ जाती है ।क्या करूँ साहब ,लब से उनके लिए बद - कलाम,निकलता ही नहीं । माना कि वह उस मक़ाम को समझ नहीं पाएगी, जो मेरे दिल में बन चूका है ,उसके लिए ।लेकिन मुझे वह ऐसे ही अच्छी लगती है , एक नादान दोस्त की भांति । प्यार तो उस भक्ति भाव के जैसा है ,जहाँ वियोग में भी मीरा कृष्ण को प्राप्त कर लेती है । प्रेम को परिष्कृत होने के लिए ,किसी संबंध की आवश्यक्ता ,नहीं है और अगर आवश्यक्ता पड़ती है ,तो वह प्रेम नहीं मोह मुद्गर है । मेरी प्रेमिका ,मेरे नज़्मों और कविताओं में ,तथा इन सबसे ऊपर मेरे हृदय में अंकित है ।मेरे नैसर्गिक प्रेम को यह पंक्तियां समर्पित हैं ।

Word meanings :
परिष्कृत - refined /pacified.
नैसर्गिक - स्वाभाविक/प्राकृतिक(connatural).
तुलु-ए-इश्क़ -rise of love .

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Very well said

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