बदलता पर्यावरण : धरती माँ के लिए अभिशाप

सभी आदरणीय कवियों एंव कवयित्रियों को मेरा सादर नमन
मैं निशु भारद्वाज आज आपके सामने एक गंभीर विषय पर एक कविता प्रस्तुत करने जा रहा हूँ एंव सभी से निवेदन करता हूँ कि जो मैं कहना चाह रहा हूँ उसको आप समझे एंव पर्यावरण के लिए अच्छे कार्य करे

4 पंक्तियों से मैं अपना काव्य परिचय देना चाहूँगा

"लिखता हूँ मैं जीवन को
इश्क बहुत कम लिखता हूँ
समर्पित हूँ इस धरती को
उसका दुख मैं लिखता हूँ "

अब मैं कविता को प्रारम्भ करता हूँ जिसका शीर्षक हैं -
बदलता पर्यावरण : धरती माँ के लिए अभिशाप

ये कैसा नजारा अब नजर आ रहा हैं
वृक्ष पतन करके कंक्रीट छा रहा हैं
दिवारे सजी हैं आजकल ए.सी. से
प्रकृति से प्रेम का अब कागजी सा नजारा हैं
प्रकृति से प्रेम का अब कागजी सा नजारा हैं

कट रहे हैं रोज वृक्ष यहाँ, बढ रहा हैं स्वार्थ यहाँ
विलुप्त हो रहे पक्षी सारे, अब प्रकृति से प्रेम कहाँ

परेशान हैं पशु पक्षी अब, मानवता शर्मशार हैं
वृक्ष काटकर धनी जो बैठे, झाड़ रहे वो ज्ञान हैं

हरियाली अब खत्म हो रही, बढती सूर्य की ज्वाला
बढता प्रदूषण देखो, अब निगल रहा जीवन प्यारा

जो जीवन तुमको देते हैं, तुम उनसे धोखा करते हो
स्वार्थ हित के कारण ही, तुम वृक्ष पतन अब करते हो

कैसा ये सृजन हो रहा, अपने हाथो पतन हो रहा
पेड पौधे सभी काटकर, कंक्रीट का उपवन हो रहा

वृक्षो की महिमा को जानो
आओ मिलकर वृक्ष लगालो
जीवन को सुरभित कर डालो
निज आर्यव्रत की रक्षा का
मिलकर सारे प्रण है लेलो

लेखक- निशु भारद्वाज
स्थान - मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश)
दूरभाष - 8755732732

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beautiful :slight_smile: @Nishu_Bhardwaj

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Thank you

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Great post, indeed. :writing_hand::blush:

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