"धोका"

धोका वो परछाई है
ना दिखती है, ना छुपती है
खुद से खुद में पलती है

धोके के लिए वक़्त का इंतेज़ार करते
अपना बन अपनो को दिया धोका
एक बंधन में बंधे थे
रिशरों की डोर से ज़िन्दगी साझा करने को

अपना बन कर वो कैसे मुझे धोका दे गए
मेरी ज़िन्दगी के मीठे ख्वाब लूट गए
दर्द वो इतना गहरा दे गए
चाह कर भी यक़ीन ना कर पाऊँगी

नया खेल होगा उनके लिए
मैंने तो बस जिना चाहा था उन्हें
मेरी परछाई बन मेरे ही अस्तित्व को मिटाते चले
अपना बन कर वो कैसे मुझे धोका दे गए

© शगुफ़्ता के क़ादरी
दिनांक: २२/०८/२०२०

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Truly said. :heart:
Beautifully presented. :heart:

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Pleasure that you like it💝

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Wow

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Thank you

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Very well composed… :sparkles:

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Humble gratitude :blush: