कर्ज़ बकाया रख्खा है

जेबें भरी है लेकिन, कुछ कर्ज़ बकाया रख्खा है
कहीं वो भुला न दे मुझे इस डर से
खुद को कर्ज़दार बनाए रख्खा है।

तनहाई का जश्ऩ है महफिल सजाई है उसने
कोई भांप लें न गहराइयाँ
यूँ खुद को सजाए रख्खा है ।

उसे क्या फिक्र पिघलते मोम की
क्या डर अंधेरों का उसे
जिसने खुद को जलाए रख्खा है ।
Hamida

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Wow, deep. :blue_heart:

waah :sparkles::sparkles:

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