सबकी मां, तूं हीं जहां।

सबकी असली मां,
होती है धरती मां,
इससे ही सबकुछ जना,
वापस इसमें ही होता खपन,
इसमें जितना धैर्य,
उतना नहीं दूसरा उदाहरण।

हम इसको कितना सताते,
तरह तरह से नुकसान पहुंचाते,
इसको इतनी पीड़ा देते,
इसकी बेटी है प्रकृति,
उससे भी खिलवाड़ करते,
लेकिन इसको कभी क्रोध में न पाते।

जब जो भी कुछ चाहिए,
हम इससे मांग लेते,
ये हर्ष से खोल देती द्वार अपने,
हम इसकी बेदना की परवाह नहीं करते,
बस अपना स्वार्थ निकालते,
फिर बाद में,
इसको तड़पता छोड़ देते।

लेकिन ये है मां,
ये भी बिगड़े बच्चों को सबक सिखाती,
कभी बाढ़ जैसा उग्र रूप दिखाती,
कभी भुस्खलन के रूप में सामने आती,
परंतु अगर बच्चे समझ जाएं,
तो उन्हें तुरंत गले से लगाती।

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