मैं माफी मांगने आई हूँ

मैं माफी मांगने आई हूँ

हमको माफ करना माई
मैं माफी मांगने आई हूँ
शर्मिंदा हूँ बहुत मगर
फिर भी तेरी परछाई हूँ।

जब तू थी चुस्त दुरूस्त
तब मैं भी तो तंदुरूस्त थी
तुझको दूषित कर दिया जब से
तब से मैं भी तो मुरझाई हूँ।
मैं माफी मांगने आई हूँ।

तेरी फसलों में ज़हर मिलाया
तेरी नदियाँ प्रदूषित कर डाली
तेरी समंदर मैले कर डाले
और अब छान के पानी लाई हूँ।
मैं माफी मांगने आई हूँ।

तेरे कटते जलते जंगल अब
मेरे फेफड़ों पे हसते हैं
प्रगति के इस धुएँ में साँस लेने
मैं ऑक्सीजन सिलिंडर लाई हूँ।
मैं माफी मांगने आई हूँ।

तेरे तपते बदन छाले
मेरे तन पर दिखते हैं
प्रकृति की बेहती ढलानों से
मैं मरहम मांग के लाई हूँ।
मैं माफी मांगने आई हूँ।

यह प्रकृति तो रब की भेंट है
फिर भी मलया मेट है
आओ फिर इसे संभाले
हरियाली से इसे सजाले।
चलो नदियाँ, समंदर, हवाएँ छानलें
और इसको अपना धरम मानलें।
अगर साधनों पर अधिकार है
तो यह तो परिवार है
मैं माँ की चिट्ठी लाई हूँ।
मैं माफी मांगने आई हूँ।
हमीदा

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Wow! :heart:
That’s really a different thought to put on, so interesting. We should be sorry and we really are, to our dear mother nature! Really liked your thoughts. Keep growing. :heart:

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