ख़ामोश हर्फ़

अब से हर हर्फ़ ख़ामोशी के मुहाफ़िज़ है।
अपनी आज़ादी से मुख़ालिफत में लगती ज़ेहनी साज़िश है।

तुझे मेरे सुपुर्द यूँही नहीं किया गया है।
हम तेरी रग रग से वाक़िफ़ है

Shah Talib Ahmed

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