नादान ख़फ़ा है , कल ,परसों से?

नादान खफ़ा है हमसे कल परसों से।
रहबर है वो हमारे बरसों के

ख़्वाबों की ताबीर हो रही थीं।
देखें थे जो हमने अर्सो से

तेरे ज़िक्र करते नहीं थकते हम पर्चो में।
इस से पहले की वाक़या ये आ जाये चर्चों में

लौट आओ के बहार का मौसम आया है।
बारिशों से आसमाँ मोतियों से ज़मी को सजाया है

फ़र्ज़ पूरा होगा, तकबीरो को तस्लीम करने में।
तन्हा रहे तो मर ना जाये कहीं हम कल परसों में

Shah Talib Ahmed

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