"महज़ मायूसिया"-----

अब महज़ मयूसिया ही नही है पंछी को,
उन्हें उजाला मिल गया है किसी कोने में।
होकर भी कितने करीब वे कितने दूर है!
इन दूरियों में भी उनको कितना सुकून हैं।।

बुन चुके अपने अपने नीडो को तिनके से,
बैठे बैठे किसी तलाश में गुजरा उनका दिन,
डाल डाल पर खिलखिलाती उनके स्वर,
अब बस क्रंदन शेष है उन पंछियो के घर।।

बीत गये कितने बसन्त व्यस्त बाना,
चिर ह्रदय ने छोड़ दिया है मुस्कुराना,
अब उन्हें अच्छा नही लगता है कही
दूर तक अपने पर फैलाये उड़े जाना।।

ज़माने की जंग में आसमाँ को छूने चले,
उन नादान पंछियों को कब किसने देखा?
लेकिन फिर भी उन आखों ने हर अंधेरी,
रातो के बाद सुबह के सूरज को देखा।।

     शिवेंद्र मिश्रा"आकाश"
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