" माँ " ।

एक नापाक पानी से पाकीज़ा कर ,
तूने ही दुनिया का चेहरा मुझे दिखाया था ।
गर्भ के अंधकार से निकाल कर ,
तुने ही मुझे रौशनी की तरफ बुलाया था ।
तेरी खुशी की सीमा न रही ,
जब मैंने “माँ” शब्द अपने होठों पे लाया था ।
जब रोया था मैं भूख के मारे,
तो ह्रदय से ममता प्रेम का पियूष पिलाया था ।
कितनी उदार है तू ऐ जननी ,
नौ महीनों की यातना को एक पल मे भुलाया था ।
रोया होगा विधाता करुणामय होकर ,
जब उसने “माता” रूपी अनुपम कंज खिलाया था ।
ख़ुद की ना चिंता है जिसको ,
यह महान परोपकार भी “माँ” ने ही सिखाया था ।

                         - शाहीर रफ़ी
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