गज़ल: कह नही पाये

तुमसे हम ‘कुछ’ कहने की फ़िराक में,
‘कुछ’ तो सोचते रहे पर कह नही पाये।।

ये आँखे, ये चेहरा देखने मे हम डूबे रहे,
मगर इनके रूठने के डर को सह नही पाये।।

सजीव रचना को हमने कल्पित कर दिया,
लेकिन उस ऐसी नजीर को हम क्या दे पाये।।

इतना तुम हँसती हो कि जितना कभी नही,
इस हँसी में कितना ग़म छुपा बयाँ न हो पाये।

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Shandaar :ok_hand:

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शुक्रिया :pray:

:heart::heart:

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:fire:

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Thank you ji

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Thanks :pray:

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