बैठे है

जाने कितने अश्क छिपाएं बैठें हैं
जाने कितने…दर्द दबाएं बैठें हैं

वो फिर हमसे मिलने आए ही नहीं
हम कब्र तक…आस लगाएं बैठें हैं

कि तू न रिस पड़े इन आंखों से मेरी
तेरे जिक्र को होंठों में सिलाएं बैठें हैं

ऐ ग़म ए रात…अब तो छट जा
कब से आंखों में चराग़ जलाएं बैठें हैं

हम ग़ज़ल लिखने की आस लिए
खुद को क़ाफ़ियों में उलझाएं बैठें हैं

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:heart::heart:

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waah

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:blush:

:pray: