कोई मिलने नहीं आता है अब....।

कोई मिलने नहीं आता है अब ,
यह त्योहार लागतें हैं अब बेमतलब ।
बेरंग से पड़े रहते हैं यह सफ़ेद कपड़े ,
अब कोई पूछता नहीं के होली है कब ।
हताश से पड़े रहते हैं यह रंगीन पिचकारियां,
यह ग़ुलाल भी किस गाल की दे दुहाइयां ।
वह ठंडाई के बहाने भोले का प्रसाद पीना,
वह उत्साह और उमंग की ज़िंदगी जीना ।
अब भूल चुके हैं अंदाज़ अपने त्योहारों का,
मशीन की अब लग चुकी है सबको तलब ।
कोई मिलने नहीं आता है अब ।
न मैं सभ्यता ,न संस्कृति की दुहाई देता हूँ,
न मैं आधुनिकता के लिए बधाई देता हूँ ।
बस याद रखना उन पुरानी मस्तियों को ,
बचपन के कुछ रंगीन हस्तियों को ।
होली के इस पावन अवसर पर ,
तुम्हारे विवेक को यादों की मिठाई देता हूँ ।
कहाँ हैं वह अबीर के महारथी ?
कहाँ हैं वह रंग-ए-बहार के मतवाले ?
कहाँ है अब वह मतवालापन ,
वह प्रकृति का सौंदर्य,वह निराला बचपन ।
अंतः करण से पूछता हूँ ,
वह होली खेलने फिर आएंगे कब ?
हक़ीक़त से जवाब यह मिलता है ,
कोई मिलने नहीं आता है अब ।
कोई मिलने नहीं आता है अब ।।

  • शाहीर रफ़ी

#होली की सबको हार्दिक शुभकामनाएं #Happy Holi

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bahut khoob mere dost @Shaheer_Rafi
and Happy Holi

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