फ़र्ज़ बाप का।

अपनों ने जो चाहा, सब दिलाया है मैंने,
मत पुछ इस बीच क्या कुछ गँवाया है मैंने,
नींद, चैन, सुकून सब हँस कर दे दिया,
नसीब बदले में ख़ुद लिखवाया है मैंने,
परवाह ख़ुद की कभी की ही कहाँ,
अपनों की फ़िक्र में हर पल बिताया है मैंने,
रात-दिन बहा कर ख़ून पसीना अपना,
ख़्वाब अपनों का साकार करवाया है मैंने,
दे कर ज़माने भर की ख़ुशियाँ उन्हें,
हर दर्द को सीने से लगाया है मैंने,
उम्र क्या बढ़ी, क़दर घट गई मेरी,
फिर भी उनपे प्यार ही लुटाया है मैंने,
कर आया हूँ सब कुछ नाम उनके,
फ़र्ज़ बाप का आज भी निभाया है मैंने।
©️रमनदीप सिंह सहगल

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