मेरे पापा की कविता

मेरे जीवन में एक और खुशनसीबी है,
मां के बाद उनकी ही मूरत है ।
जिसे मै पापा केहता हूं,
बस वही मेरी सूरत है ।

बाते अकसर होती नहीं पापा से,
जरा लेट जो आते वो बाहर से ।
मै भी करता नहीं इंतज़ार ,
क्यों की मां सुला देती हर बार ।

मुझे याद है वो दिन ,
जब उन्होंने मुझे मारा था ,
गलती की थी मैने,
फिर बाद में मुझे समझाया था।
कुछ अलग था उनका अंदाज़ मां से,
अपना प्यार ऐसे ही जताया था ।

मुझे साइकिल पर बैठा कर बाज़ार घुमाया करते थे,
वो मुझे बिस्कुट का पैकेट ही दिलाया करते थे,
मेरे पापा थोड़े स्वाथ प्रेमी है,
इसीलिए बाहर ही चीज़े कम ही दिलाया करते थे ।
वो मेरे पापा है जो मुझे काबिल बनाया करते थे ।

बड़ा हो गया और उनसे थोड़ा दूर हो गया हूं ।
पढ़ने जो आया हूं घर से दूर,
इसीलिए उन्हें याद करने लगा हूं ।
वो अक्सर कहते बेटा कोई दिक्कत हो तो कहना ,
और मै ये सुनते ही खुशी से भर जाता हूं ।
ये प्यार ही है उनका ,
जो अब समझने लगा है ।
दूर हूं फिर भी कुछ बढ़ने लगा हूं,
उनसे दूर कुछ चलने लगा हूं ।
वो मेरे पापा है जिनसे अब बाते करने लगा हूं ।

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Behad khoob :sunflower:

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Thankew so much :heavy_heart_exclamation:

Congratulations :sunflower::sunflower:

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Thankew :heavy_heart_exclamation:

Congratulations. :cherry_blossom:

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