वो सुहाने पल

मेहफिल जमी थी किसी किनारे मे , रंग उड़ा था उसी पेमाने मे |
खिल कर कही निकली थी हँसि की ठिठोली , भर आई खुशिया हमारे आंगन की झोली |
घुल मिल गए थे हम उसमे कही , मानो झूम रही थी हमारी दुनिया उसमे कही |
वो भी क्या रंगीन शाम थी , हलकी सी धुप और हलकी सी छाओ थी |
वही कही पंछी भी गुन गुना रहे अपने गुणगान , उड़ रहे थे ऐसे मानो कोई विमान थे |
फिर आई वही जिसका सबको इंतज़ार था , जैसे शामो के ढलते हुए दिन का इंतज़ार था |
अब चलना था हमे क्योंकि अब सड़क सुनसान था , गुजरना था हमे उस गली, जिस पर ये दिल कुर्बान था |
जो आश् थी हमारे दिल मे , उसका यही बयान था |

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