कब तक?

हाँ मानते हैं
तेरे इश्क में शुमार रहे हम,
तहे दिल से इन लम्हो के
शुक्रगुज़ार रहे हम,
मीठे एहसास, अनदेखे ख्वाब,
और वो सारे अनछुए जज्बात,
मेरे न हो ते,
अगर तुम मेरे रस्ते,
गुज़रे न होते,
माफ़ करना,
फिर भी पूछते हैं,
यूँ तेरा बेवजह सपनो में सताना,
बरसों पुराने चेहरे का,
यूँ बेबाक दीदार कराना,
तेरे नाम की झलक,
और दिल का कराहना,
आखिर ये चलेगा कब तक?
सुना है, अब तो वो रास्ता भी
पक्का हो गया है,
जो तेरे घर होकर जाता था,
और मैं लम्बे रास्ते चुनूँ,
आखिर कब तक!! :broken_heart:

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Beautifully written! :heart:

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:heart::heart: