एकान्त

बन्द कमरों में खुल सी गई किताब की तरह,
पन्ने जिसकी पुरानी स्याही से पीले हो गए,
मैली हो गई थी जो जिल्द सालों से,
एकान्त के झरोखे से धूल सारी उड़ सी गई।
आज झांकने पर दीवार के मोखे से,
मुझे वो भीड़ नजर नहीं आती,
क़ैद थी पहले से रूह मामलों में कई,
अब बस जिस्म दीवारों के परे हैं।
सुनसान हैं गलियां उस शहर की भी,
जहां जिंदगी मुसाफिरों से थी,
जगमगाती रात और गुनगुनाते दिन थे,
गुमनाम सन्नाटा और बेनाम खामोशी है जहां।

  • श्रद्धा गौड़
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Nicely written. :heart:
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