चलो मुसाफिर ...।

poem
#1

दुर्गम मार्ग ,कठिन रास्ता है ,
तनिक संभल-संभल के चलो मुसाफिर ।
ठोकरें खानी है बहुत ,
ज़रा शूरत्व के साथ चलो मुसाफिर ।
न जाने किन-किन बदबख्त गलियों में,
नज़मो का काफ़िला ले जायेगा ।
एक भावनात्मक हृदय पर ,
समाज चरित्रहीन होने का कलंक लागयेगा ।
इसीलिए कहता हूँ ऐ अमृतमय साथी ,
इज़्ज़त का ख़याल भुला के चलो मुसाफिर ।

यहाँ एलची बहुत हैं चुगलखोरी के ,
राज़ अपने छुपा - छुपा के चलो मुसाफिर ।
मुनाफ़िक़ों की बस्ती मे तुम ,
सगुणी सत्यवान न बन के चलो मुसाफिर ।

तुम निर्मल हो ,तुम अटल हो ,
तुम अनंत हो ,तुम उज्जवल हो ।
ईर्ष्या और द्वेष को मिटा कर ,
अनहद नाद तुम गा के चलो मुसाफिर ।
गीत ऐसा गाओ सुमिरन जैसा लागे ,
संपूर्ण सुर साधना करवा के चलो मुसाफिर ।
जो भी करो लेकिन ,
जनकल्याण मे कभी चौकीदार न बनो मुसाफिर ।

             - शाहीर रफ़ी
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#2

I am seriously very impressed with your writing style. @navjyotsingh.rajput what do you say?

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#3

@thegurjyot he is indeed lit and knows what to put and where to put

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#4

Boss
Tum bahut mast likhte ho
Or Gazab ke writer ho
Hindi or shabd bahut sahi pakad hai tumhari

:ok_hand::ok_hand::ok_hand:

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