तुम सुनों तो बताऊँ जज़्बात क्या थे?

तुम सुनों तो बताऊँ जज़्बात क्या थे?
दिल की हालत कुछ ऐसी थी -2
साँस तो रुक गई थी। पर दिल की धड़कन जारी थी।।
शरीर तो मृत - सा हो चुका था -2
ख़्वाब मेरे अर्थी पर सज गए थे।।
तुम सुनों तो बताऊँ जज़्बात क्या थे?

चल तो मैं रहीं थी। राहों में मगर, कदम मेरे कप - कपाए थे।
मंज़िल तो थी। सामनें मगर, मेरी आँखें उसे छू करके,लौट आती थी।।
तुम सुनों तो बताऊँ जज़्बात क्या थे?

भीड़ तो थी। बहुत अपनों की मगर, जहाँ भी देखा,मैंने ख़ुद को तनहा पाया था।
निकली जब रिश्तों के बाज़ार में थी। किसी ने मूल्य ना मेरा समझ था।
सबने रद्दी समझ, मुझको नकारा था।
तुम सुनों तो बताऊँ जज़्बात क्या थे?

चल कुछ ऐसे रहीं थी। मैं जैसे हर पल बेड़ियों का पहरा हो पैरों में,
पैर रखनें थे। संतुलन में, दोनों पैरों का संतुलन बनाए रखना था।।
तुम सुनों तो बताऊँ जज़्बात क्या थे?
टूटा ख़्वाबों का महल, बिखरा पड़ा था -2
बस बची ज़मीन हमारी थी। उस ज़मीन पर फिर से,
ख़्वाबों का महल बनानें की, यह जीमेदरी हमारी थी।।
तुम सुनों तो बताऊँ जज़्बात क्या थे?

रेत से पैर जैसे फिसलते हो। ऐसे मैं हर पल फिसलती थी।
हर घड़ी - हर पल में डरती थी। ऐसे मैं डर में जीती थी।
देख करके खुद को आयेने में, मैं डर से थर - थराती थी।
हर एक चेहरे से में डरती थी -2
जानें कौनसा नक़ाब ए कब दिखाएगे।
इसलिए हर एक चेहरे से, मैं डरती थी।।
तुम सुनों तो बताऊँ जज़्बात क्या थे?:writing_hand: Js Gurjar

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