अश्क-ए-मलाल

sad
poem
shayari
#1

सुकून-ए-दिल कभी मिला ही नहीं,
तेरी यादें सताती रही, हम से गिला करके.

सज़ा-ए-फ़ुर्क़त तो मिलनी ही थी,
जो हम जी रहे थे, अपनों को भुला करके,

ज़ख़्म-ए-दिल हम कुरेदते रहे,
के तुम आकर भर दो इन्हें सहला करके,

ग़म-ए-निहानी मिलकर देखते अगर,
थक गये थे खुदको आँसू पिला करके.

आज़ार-ए-मोहब्बत से दूर अब चले गए हम,
एक तुझे ही, अपने करीब बुला करके.

अश्क-ए-मलाल अब क्यूँ गिराते हो कब्र पे,
क्या चैन नहीं मिला, हमें मिट्टी में मिला करके.

सुकून-ए-दिल - Peace of Mind
ग़म-ए-निहानी - Hidden Sorrow
सज़ा-ए-फ़ुर्क़त - Punishment of Separation
अश्क-ए-मलाल - Tears of Regrets
आज़ार-ए-मोहब्बत - Suffering of Love

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#2

bohot khoob veere… bohot khoob…

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