वह भूल जाएंगे ...।

वह भूल जाएंगे…
वह भूल जाएंगे…।

मेरे कर्मठ पसीने से निकले फ़ूल को ,
मेरे निस्वार्थ भाव से किये भूल को ।
जीवन के हर उस सच्चे ऊसूल को ,
वह व्यर्थ के मेहनत -ए- फिज़ूल को ।
वह भूल जाएंगे…
वह भूल जाएंगे…।

मेरी चिता के ऊपर यूँही बैठ कर ,
मेरी मौत का जश्न वह मनाएंगे ।
जब आएगा शमशान नज़र ,
तोह मन ही मन वह इत्रायेंगे ।
वह भूल जाएंगे…
वह भूल जाएंगे…।

मेरी याद मे कोई अगर घमज़ुदा होंगे ,
तोह वह मेरे अपने नज़्म रहेंगे ।
मेरी फनकारी की अनोखी दास्ताँ ,
जो अपने ज़ुबान से कहेंगे ।
गर रहे तारीक -ए-शाहीरी आबाद ,
तो कुछ पागल मुंबत्ती जलायेंगे ।
मेरे बेजान से तस्वीर पर ,
एक फ़ूल की माला भी चढ़ायेंगे ।
और इतने मे नौटंकी ख़त्म न हुई ,
तो कुछ मगरमच्छ के आँसू भी बहायेंगे ।
इन् बनावटी चेहरों को पूछो ,
क्या सिख आनेवाले युग को यह सिखायेंगे ।
वह भूल जाएंगे…
वह भूल जाएंगे…।

मै कोई ग़ालिब या मीर नहीँ ,
मै कोई पीर या फ़क़ीर नहीँ ।
फिर क्यों भला यह मुझे चाहेंगे ।
कुछ दिन के झूठे हमदर्द बन ,
अपने औकात मे यह आजायेंगे ।
जो प्रसंशा करते है अभी ,
वह गालियाँ भी बरसायेंगे ।
वह भूल जाएंगे…
वह भूल जाएंगे…।

#मशाहीर ए अदब

      - शाहीर रफ़ी
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