हाँ - हाँ मैं एक औरत हूँ!

हाँ - हाँ मैं एक औरत हूँ

 राह चली मैं राह चली!
हर एक रिश्तें की राह चली!!

पीहर की राह चली!
ससुराल की राह चली!!

       पीहर में भी पराई पहचान मिली!
   ससुराल में भी पराई पहचान मिली!!

क्योंकि मैं, एक औंरत हूँ!
हाँ - हाँ मैं एक औरत हूँ!!

  पढ - लिख कर मैं, तो होशियार बनी पर समाज,

की तुच्छ सोच बालों की नज़रों में,मैं बेकार बनी!!
क्योंकि उनकी नज़र में, मैं चार दीवारों में और
एक गज के घूँघट में सजी,
क्योंकि मैं, एक औंरत हूँ!
हाँ - हाँ मैं एक औंरत हूँ !!

छोटें कपड़े पहनती हो! देर - रात घर आती हो!!
हो जाए कुछ गलत तो समाज हमारे कपड़ों और,
हमको ही गलत ठहराता हैं! ए तानों - बानों की भी,
बोछार को हम ने सहा हैं!
क्योंकि मैं, एक औंरत हूँ!
हाँ - हाँ मैं एक औंरत हूँ!!

समाज की हमारे प्रति, सोच एक माँ, बहन, बेटी, बहू ए सब चार दीवारों,
में एक गज के घूँघट में सजी, यही इनके ज़हन में तस्वीर बनी हैं!
क्योंकि मैं एक औंरत हूँ!
हाँ - हाँ मैं एक औंरत हूँ!!

लड़कियों पर रोक - टोक लगातें हो! इसे संस्कार का नाम देते हो!!
पराए घर जाना हैं! ए कह कर बोझ के तले दबातें हों!!
क्योंकि मैं एक औरत हूँ!
हाँ - हाँ मैं एक औरत हूँ!!

:writing_hand:js Gurjar

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