" ठीक हूँ हँस तो रहीं हूँ "

हँसी रखती हूँ चेहरे पे ताकि दिखे न वक़्त के गम
जमाने को मेरे , माँ कहती है अपनी कमजोरी किसी को बताना नहीं चाहिये जैसे-जैसे बड़े होती जा रही हूँ
उनकी बातें अब सच लगने लगी हैं ।

कई बार एक ही जोक पे बार-बार हँसती हूँ ,
शायद अंदर से थोड़ी टूटी और बिखरी हूँ ,
ये गम के टुकड़े पैरों पर ना आ जाए दुनिया के इसलिये दोस्तों की झोली मे रखती हूँ ।

हाँ थोड़ी मतलबी हूँ बस सच्चे लोगों से और बेजुबां जानवरों से रिश्ता रखती हूं , पहले ज्ञान देने की आदत थी , अब चुप रहना पसंद करती हूँ ।

ज़्यादा भीड़ से डरती हूँ ,वहीं पुराने 4-5 दोस्तों से गहरी अपनी दोस्ती रखतीं हूँ , उदास भी होती हूँ , निराश भी होती हूँ ,पर कोई पूछें कैसी हो ? कहती हूँ ,
" ठीक हूँ हँस तो रहीं हूँ "

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