दिल्ली जल रहीं है

ये जो नेताओ की जुबां जहर उगल रहीं है।
इन्हीं के कारनामों से दिल्ली जल रहीं है।
लोग मन बैठे हैं सच मत भेदों को।
माँ लड़ते देख रहीं है अपने बेटों को।
सब ताक में रख रहे है लोग अपनों को।
कुछ सुझ नहीं रहा इन बेहाल लोगों को।
यह भाषा की नमक घाव में नमक मल रहीं है।
इन्हीं के कारनामों से दिल्ली जल रहीं है।
आज कल किताबों से हमारी दोस्ती कम है।
Social media से चिपके हुए बैठे हम हैं।
जिसके हवाले से सोच को बदला जा रहा है।
पत्रकारो के हाथों समाज ही धकेला जा रहा है।
इनके विद्रोह की केतली में दंगों की चाय उबल रहीं है।
इन्हीं के कारनामों से दिल्ली जल रहीं है।
कोई और नहीं इसके पीछे, ये नेता ही दंगा भड़काते है।
लोगों की लाश पर रो कर ये अपनी कुर्सी बचाते है।
फिर तसल्ली देने के नाम पर ये लोगों को उकसाते हैं।
यूँही ये अंधों की जनता की साहसी सारथी बन जाते है।
इस कदर अब इंसानियत अपनी तारीख बदल रहीं है।
इन्हीं के कारनामों से दिल्ली जल रहीं है।

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Marvelous penned … Kudos to you …

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It’s my pleasure

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Katai zahar…

@_Rahguzar: stunning brother, seedhe dil pe chot kar gayi❤

bohot badhiya…:heart_eyes::ok_hand:

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Shukriya

Main kahunga meri khosis kamiyab rhi fir

Aapka Shukriya