बंद करो नफ़रत, मनाओ होली।

सर्दी जा रही है,
गर्मी दस्तक दे रही है,
प्राकृति भी आंख खोल रही है,
हरियाली छा रही है,
अजब उर्जा है,
सबकुछ संगीतमय है।
जब प्राकृति के रंग है चरम सीमा पर,
तो होली का आगमन है निश्चित,
हर कोई तैयारी में जुटा,
नये नये सपने गढ़ रहा,
बच्चे कर रहे अपनी पिचकारी दुरूस्त,
कैसे रंगना है अपने दोस्तों को भरपूर,
पिछले साल ड़कू ने की थी पहल,
इस बार हिसाब चुकता है करना।
युवाओं की है अलग सोच,
मिलते हैं कहीं अपनी प्रेयसी से एक ओर,
पढ़ाई से थक चूका हूं,
उसके साथ करलें कुछ मनोरंजन,
मैं उसे रंगू,
वो मुझे,
वो भी हो रंग में लथपथ,
मैं भी हो जाऊं रंगों रंग,
फिर दोनों बहकें,
भांग के शरूर में चहकें,
नाचे ढोल की थाप पे,
रहें होली के राग में।
बड़ों की बात है निराली,
उनको भी याद आती जवानी,
जब अपनी पड़ोसन को रंगा था,
क्या समां बंधा था,
वो शरमाई भागी,
और मैं पीछे पीछे,
पकड़ा उसको गली में,
कर दिया रंगों रंग,
वोला! बुरा न मानो,
होली मना लो।

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