जनाज़ा उठ रहा है

मेरे महबूब से जाकर कोई कह दे आज जनाज़ा उठ रहा है मेरा
आज तो अपने रूख से दुपट्टा हटा कर मुझसे नजरें मिला ले
नहीं देखूंगा उसका वो फूल सा चेहरा आंखें बंद होंगी मेरी
बस इक इल्तेज़ा है दिल में मेरे मेरी क़ब्र पर इक हाथ मिट्टी चढ़ा दे

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