कुछ ऐसी है मेरी मुहब्बत

कुछ ऐसी है मेरी मुहब्बत कि मुझको सोने नहीं देती
हो जाऊं ग़र ख़फ़ा उससे तो खुद रोती है बेइंतिहा
ये दस्तूर ए फ़ितरत नहीं है उसकी ए ज़ालिम दुनिया
क्यूंकि अगर मैं रोता हूं तो मुझको रोने भी नहीं देती

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