ग़ज़ल

दरिया में वो साहिल दरकिनार ही है ,
दिल में वो है, जो बेहिसाब ही है ।।

तर हवा सा मेरा उसका सफ़र ही है ,
ना जाने क्यों मेरी क़िस्मत बदबख़्त ही है ।।

यूं तो हर शख़्स अकेला है भरे संसार में ,
फिर भी दिल के मुकद्दर में तन्हाई ही है ।।

पुराने दरख़्तों का आलम क़फ़स सा है ,
कि जिसमें मय की महफ़िल होती ही है ।।

जिंदगी तिश्नगी के गिर्दाब में कैद़ ही है ,
आराईश आब-ए-चश्म में छिपे ही है ।।

( तर - नमी युक्त ; बदबख़्त - अभागा ; दरख़्त - पेड़ ; क़फ़स - पिंजरा
तिश्नगी - इच्छा ; गिर्दाब - भंवर ; आराईश - सजावट ; आब -ए- चश्म - आंसू )

3 Likes