परीक्षाओं का समय।

फरबरी का हो रहा अंत,
बैंलटाईन का खुमार भी हो रहा समाप्त,
पढ़ाई का जोर है,
परीक्षाएं नजदीक हैं,
पल-पल एहम है,
साल भर की मेहनत का प्रतिफल है,
बहुत ही कठिनाई का वक्त है,
बस किताबें ही किताबें आ रही हैं नजर,
दोस्तों से भी मिले हुए बीत गए दिन,
सोशल मीडिया भी खामोश है,
न मैसेज आ रहा है,
न मैसेज जा रहा है,
गर्लफ्रेंड से मिलना भी सस्पैंड है,
न वो काल करती है,
न मैं कर पाता हूं,
बस बीच में लटका रहता हूं,
कई बार मन सोचता,
बैलंटाईन का हैंगओवर ही पूछ लें,
लेकिन दिमाग कहता,
पढ़ाई पे रख ध्यान,
गर्लफ्रेंड कहां जाएगी भाग,
बस इसी कशमकश में जीता मरता हूं,
किताबों को चाटने में लगा रहता हूं।
बहुत दिन हो गए,
फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पे भी नहीं गया,
ये एग्जाम क्या आए,
सोशल मीडिया पे उठना बैठना भी बंद हो गया।
कोस रहा हूं,
एग्जाम बनाने वाले को,
कैसा ये सिस्टम बनाया,
जहां छात्र छात्राओं का मिलना जुलना भी दुश्वार करवाया,
हर सांस में किताबें घुम रही हैं,
सोच समझ भी इन्हीं तक सीमीत हो गई है।
काश! ऐसा होता,
मज़े‌ मज़े में ही एग्जाम होता,
न पास का डर,
न फेल का डर,
नम्बरों का न होता चक्र,
नौकरी के लिए,
डिग्री न कोई पुछता,
बस अनुभव को एहमियत देता,
तो एग्जाम का टांटां भी नहीं होता।

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